ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर (OCD) एक ऐसा मानसिक विकार है जिसमें व्यक्ति का व्यवहार नॉर्मल नहीं रहता। रोगी को लगातार परेशान करने वाले विचार आते हैं और उन विचारों के कारण वह एक ही काम को बार-बार करता है। इससे अक्सर घर या आसपास के लोग परेशान हो जाते हैं और रोगी की दिनचर्या पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। जागरूकता, रोग की जल्दी पहचान और जल्दी इलाज से ओसीडी को कंट्रोल किया जा सकता है।

ओसीडी ब्रेन हेल्थ को कैसे प्रभावित करता है?ओसीडी मस्तिष्क के कुछ हिस्सों के काम करने के तरीके में बदलाव से जुड़ा है। ओसीडी से पीड़ित लोगों में फ्रंटल लोब और बेसल गैन्ग्लिया जैसे एरिया अधिक सक्रिय होते हैं। मस्तिष्क के ये हिस्से निर्णय लेने, भावनाओं को नियंत्रित करने और आदतें बनाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। ओसीडी से पीड़ित लोगों का दिमाग बार-बार ये सिग्नल भेजता है कि कुछ गड़बड़ है, लेकिन असल में सब ठीक होता है। यह एक इंटरनल अलार्म सिस्टम की तरह है जो गैरजरूरी रूप से बजता रहता है। इससे व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में भी खुद को असुरक्षित या असहज महसूस करता है।
ओसीडी का ब्रेन हेल्थ को प्रभावित करने का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण सेरोटोनिन केमिकल है, जो व्यक्ति की मनोदशा और सोच को नियंत्रित करने में मदद करता है। ओसीडी से पीड़ित व्यक्ति में सेरोटोनिन के लेवल में असंतुलन हो सकता है। इस असंतुलन से ओसीडी के लक्षण और भी बिगड़ सकते हैं। ऐसी स्थिति में जितनी जल्दी इलाज शुरू किया जाए उतनी जल्दी रोगी की मनोदशा को कंट्रोल किया जा सकता है।
ओसीडी को कैसे पहचानें?
बार-बार हाथ धोना, घर से बाहर निकलते समय बार-बार ये चेक करना कि दरवाजे का ताला ठीक से लगा है या नहीं, किसी चीज को बार-बार जांचना या गिनना या शब्दों को चुपचाप दोहराना भी ओसीडी का संकेत हो सकता है। ओसीडी से पीड़ित व्यक्ति कुछ समय के लिए भले ही शांत बैठ जाए, लेकिन उनकी चिंता और बेचैनी बार-बार लौट आती है, जिससे एक ही क्रिया को बार-बार दोहराने का चक्र फिर से शुरू हो जाता है। समय के साथ व्यक्ति का व्यवहार जटिल होता जाता है और उसे कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है।
ओसीडी के क्या लक्षण हैं?
ओसीडी का असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता इसलिए हर किसी में ओसीडी के लक्षण अलग दिखते हैं। ऐसे में रोगी की स्थिति के अनुसार उसका उपचार किया जाता है। आमतौर पर ओसीडी के ये लक्षण नजर आते हैं-- हर चीज व्यवस्थित रखने की सनक
- कीटाणुओं के डर से बार-बार सफाई करना
- परिवार की सुरक्षा या कुछ गलत होने के विचार आना
- बाहर जाते समय बार-बार दरवाजे का लॉक चेक करना
- अनहोनी के डर से स्विच बोर्ड या होम अप्लायंस लगातार चेक करना
ओसीडी किन लोगों को होता है?
ओसीडी स्त्री-पुरुष दोनों को होता है और यह किसी भी उम्र में हो सकता है। लेकिन हर व्यक्ति में इसके लक्षण अलग हो सकते हैं। आमतौर पर हर व्यक्ति और हर उम्र में ओसीडी के निम्नलिखित लक्षण नजर आ सकते हैं-
- पुरुषों में ओसीडी के लक्षण- पुरुषों में अक्सर कम उम्र में ही ओसीडी के लक्षण विकसित हो जाते हैं। पुरुषों में आमतौर पर इसके लक्षण ये हो सकते हैं- एक काम को बार-बार करना या कोई काम तब तक करना जब तक उन्हें संतुष्टि न मिले।
- महिलाओं में ओसीडी के लक्षण- महिलाओं में घर की सफाई या इन्फेक्शन का डर ज्यादा पाया जाता है। उन्हें इस बात की चिंता रहती है कि गंदगी या कीटाणुओं के कारण उनकी या परिवार की सेहत को नुकसान न हो जाए। कुछ मामलों में महिलाओं में पीरियड्स, प्रेग्नेंसी और प्रेग्नेंसी के बाद हार्मोनल बदलाव के दौरान उनके व्यवहार में बदलाव नजर आ सकता है।
- बढ़ती उम्र में ओसीडी के लक्षण- उम्र का भी ओसीडी पर प्रभाव पड़ता है। कुछ उम्र बढ़ने के साथ ओसीडी के लक्षणों को मैनेज करना सीख जाते हैं, खासकर वो लोग जो ओसीडी का इलाज कराते हैं। ओसीडी का इलाज न किया गया तो यह रोग बुढ़ापे तक पीछा नहीं छोड़ता। उम्र बढ़ने पर याददाश्त कमजोर होने लगती है, ऐसे में ओसीडी की समस्या भ्रमित कर सकती है। उदाहरण के लिए- एक काम को बार-बार याददाश्त की कमजोरी समझा जा सकता है, जबकि वो ओसीडी के संकेत भी हो सकते हैं।
ओसीडी को कंट्रोल करना संभव है
ओसीडी को कंट्रोल करने के लिए जरूरत है इस रोग के प्रति जागरूकता और रोग को पहचानने की। ओसीडी को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता, लेकिन रोग की जल्दी पहचान और उपचार से इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। ओसीडी के सबसे प्रभावी उपचारों में से एक है कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) जो विशेष रूप से एक्सपोजर एंड रिस्पांस प्रिवेंशन (ERP) विधि है।
इस थेरेपी में व्यक्ति को धीरे-धीरे उन स्थितियों के संपर्क में लाया जाता है जो उसकी चिंता और बेचैनी को बढ़ाती हैं। इससे व्यक्ति को अपनी चिंता, बेचैनी और ओसीडी के चक्र को तोड़ने में मदद मिलती है। थेरेपी और दवाओं के अलावा हेल्दी लाइफस्टाइल, पर्याप्त नींद, रेगुलर वर्कआउट और तनाव को कंट्रोल करने के लिए मेडिटेशन और ब्रीदिंग एक्सरसाइज भी जरूरी हैं। इसके साथ ही परिवार का सपोर्ट रोगी को जल्दी ठीक होने में मदद कर सकता है।
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