सुबह ऑफिस के लिए देर हो जाना, ऑफिस में काम की डेडलाइन, ऑफिस के प्रेशर के साथ परिवार के सदस्यों की जरूरतों का ध्यान रखने का दबाव, ये छोटे-छोटे तनाव यानी माइक्रो स्ट्रेस जब लगातार बने रहते हैं तो मन और शरीर पर इनका गहरा असर होने लगता है। हेल्दी लाइफस्टाइल, तनाव पर कंट्रोल, हेल्दी डाइट, पर्याप्त नींद और फिजिकली एक्टिव रहकर माइक्रो स्ट्रेस से बचा जा सकता है।

माइक्रो स्ट्रेस क्या है?
रोजमर्रा की जिंदगी के छोटे-छोटे तनावों को माइक्रो स्ट्रेस कहते हैं। तनाव हम सबकी लाइफस्टाइल का हिस्सा है, जिससे बचना मुश्किल है। छोटी सी बात पर किसी से बहस हो जाना, ऑफिस में जरूरी मीटिंग की चिंता, बहुत सारे काम एक साथ मैनेज न कर पाने पर कॉन्फिडेंस की कमी महसूस करना, अपनों के लिए समय न निकाल पाने का प्रेशर, ये चीजें लगती छोटी हैं, लेकिन इनका हमारे मन और शरीर पर बड़ा असर होता है।
जब ये स्थिति बार-बार आती है तो यही छोटे-छोटे तनाव जमा होने लगते हैं। ये तनाव तुरंत महसूस नहीं होते, ये धीरे-धीरे बढ़ते हैं। जब ज्यादा तनाव जमा हो जाते हैं तो व्यक्ति हर समय थका हुआ, चिड़चिड़ा या परेशान महसूस करने लगता है। अगर इन पर समय रहते ध्यान न दिया गया तो माइक्रो स्ट्रेस गंभीर रूप ले सकता है।
माइक्रो स्ट्रेस के क्या लक्षण हैं ?
रोजमर्रा की जिंदगी के छोटे-छोटे तनाव भले ही बड़े न लगें, लेकिन जब ये माइक्रो स्ट्रेस धीरे-धीरे जमा होने लगते हैं तो मन और शरीर पर इनका प्रभाव दिखने लगता है। शरीर छोटे और बड़े तनाव में फर्क नहीं करता, इसलिए बार-बार होने वाले छोटे तनाव भी व्यक्ति को लंबे समय तक तनाव में रख सकते हैं।
माइक्रो स्ट्रेस की स्थिति में व्यक्ति दिनभर की छोटी-छोटी बातों को सोचता रहता है, जिसके कारण उसे आराम नहीं मिल पाता। माइक्रो स्ट्रेस पीड़ित व्यक्ति में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं-
- चिंता-बेचैनी
- गुस्सा-चिड़चिड़ापन
- थकान-उदासी
- फोकस की कमी
- सिरदर्द
- मांसपेशियों में दर्द
- अनिद्रा की समस्या
- इम्यूनिटी कमजोर होना
किन लोगों को है माइक्रो स्ट्रेस का जोखिम?
माइक्रो स्ट्रेस रोज के छोटे-छोटे कामों और आसपास के माहौल से पैदा होता है। कोई भी व्यक्ति अपने आसपास के लोगों, चीजों और परिस्थितियों के साथ कैसे तालमेल बैठाता है, इससे तय होता है कि वह कितना तनाव महसूस करेगा और माइक्रो स्ट्रेस को कैसे मैनेज करेगा।माइक्रो स्ट्रेस का जोखिम उन लोगों को ज्यादा रहता है जो संवेदनशील होते हैं और छोटे-छोटे तनावों पर परेशान हो जाते हैं। जिन लोगों पर काम का ज्यादा प्रेशर रहता है, जैसे- एजुकेशन और हेल्थ केयर से जुड़े लोग या कॉर्पोरेट एम्प्लॉई या फिर हर काम में परफेक्शन की चाह रखने वाले लोगों को भी माइक्रो स्ट्रेस का रिस्क रहता है। ये चीजें भी माइक्रो स्ट्रेस को बढ़ा सकती हैं-
- पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ में बैलेंस न होना
- शौक या मनोरंजन के लिए समय न निकाल पाना
- मोबाइल या लैपटॉप का ज्यादा इस्तेमाल
- परिवार या दोस्तों के लिए समय की कमी
माइक्रो स्ट्रेस को कैसे कंट्रोल करें ?
माइक्रो स्ट्रेस यानी छोटे-छोटे तनावों से निपटने के लिए सबसे पहले उसे पहचानना जरूरी है। ज्यादातर लोग छोटे तनावों को नजरअंदाज कर देते हैं। माइक्रो स्ट्रेस को पहचानने के लिए यह चेक करें कि दिनभर में कौन सी चीजें आपको बार-बार परेशान कर रही हैं। जब आप उन चीजों पर ध्यान देने लगते हैं तो माइक्रो स्ट्रेस को कंट्रोल करना आसान हो जाता है। माइक्रो स्ट्रेस को कंट्रोल करने के लिए ये तरीके मददगार हो सकते हैं-
- जो काम मुमकिन न हो उसके लिए 'ना' कहना सीखें
- काम के बीच में छोटे-छोटे ब्रेक लें
- स्क्रीन टाइम कम करें
- मेडिटेशन और ब्रीदिंग एक्सरसाइज करें
- अपने शौक के लिए समय निकालें
- परिवार और कारीबियों से जुड़े रहें
- छोटे तनावों को ज्यादा समय तक मन में न रखें
- पर्याप्त नींद लें
- रोज वर्कआउट करें
- दिनभर एक्टिव रहें
व्यवहार में बदलाव को पहचानें
छोटे-छोटे तनाव तुरंत महसूस नहीं होते, ये धीरे-धीरे बढ़ते हैं। जब ज्यादा तनाव जमा हो जाते हैं तो व्यक्ति हर समय थका हुआ, चिड़चिड़ा या परेशान महसूस करने लगता है। माइक्रो स्ट्रेस को कंट्रोल करना आसान है। इसके लिए पहले माइक्रो स्ट्रेस का कारण जानें। रोज की आदतों और लाइफस्टाल में बदलाव करके माइक्रो स्ट्रेस को कंट्रोल किया जा सकता है।
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