'छी... मेरी आवाज कितनी गंदी है!': वीडियो-ऑडियो में रिकॉर्डेड अपनी आवाज क्यों नहीं आती कभी भी पसंद?

 

आवाज हमारी कुछ सबसे पर्सनल चीजों में से एक है। लेकिन जब हम किसी वीडियो या ऑडियो में अपनी आवाज सुनते हैं तो यह बहुत बुरी लगने लगती है। कई बार हम इसे अपनाने से भी इंकार कर देते हैं। क्या हमारी आवाज में सच में कोई अंतर होता है या ये हमारा भ्रम है? इस बारे में मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट प्रकृति पोड्डर ने जानकारी दी है।

why we dislike our own voice
अपनी आवाज क्यों नहीं आती पसंद (सांकेतिक तस्वीर)
जिंदगी में कभी न कभी आप ने अपनी आवाज को रिकॉर्डेड वीडियो या ऑडियो में जरूर सुना होगा और सबसे पहला रिएक्शन आया होगा कि छी.. मेरी आवाज कितनी गंदी है या ये मेरी आवाज ही नहीं है। बतौर मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट मैं आपको इसके पीछे का कारण समझाती हूं। अपनी आवाज पसंद ना आने की वजह असल में हमारी आवाज नहीं होती, बल्कि वो अनुभव है, जो रोज अपनी आवाज सुनने के बाद हमें महसूस होता है। यह स्थिति आइडेंटिटी डिस्कनेक्शन से काफी जुड़ी हुई है।

रोजमर्रा की जिंदगी में हमें अपनी आवाज वैसे सुनाई नहीं देती, जैसे कि दूसरों को अनुभव होती है। जब हम बोलते हैं, तो उसकी आवाज हमारे तक दो तरीकों से पहुंचती है। पहली हवा के जरिए, जैसे दूसरों तक पहुंचती है। दूसरी, बोलने पर खोपड़ी के अंदर होने वाली वाइब्रेशन के जरिए। यह अंदरुनी जरिया हमारी आवाज में अतिरिक्त गहराई जोड़ देता है, जिससे आवाज भरी हुई और जानी-पहचानी लगती है।



रिकॉर्डिंग में चली जाती है वाइब्रेशन

recording your own voice
रिकॉर्डिंग करने पर आवाज पर असर (सांकेतिक तस्वीर)

रिकॉर्डिंग में सुनने पर यह वाइब्रेशन चली जाती है और हमारे तक आवाज केवल हवा के जरिए ही आती है। जो हमारे अनुभव के मुकाबले काफी पतली, तेज और अलग होती है। यह अंतर हमें विचलित कर देता है। इसलिए नहीं कि आवाज अच्छी नहीं है, बल्कि इसलिए, क्योंकि यह हमारे अंदरुनी एहसास से बहुत अलग होती है। यहीं पर वॉइस कंफ्रंटेशन का अनुभव आता है।

वॉइस कंफ्रंटेशन क्या है?

वॉइस कंफ्रंटेशन वो अनुभव है, जो रिकॉर्डेड वॉइस सुनने पर वास्तविकता का सामना होने पर होता है। यह आपकी कल्पना और राय से अलग होता है। इस अनुभव के एक तरफ आपकी वो आवाज होती है, जो आप सोचते या अनुभव करते हैं और दूसरी तरफ वो आवाज होती है, जैसी लोग सुनते हैं। कई बार यह अंतर काफी ज्यादा होता है और कचोटने भी लगता है।



कॉग्निटिव डिसोनेंस के करीब की स्थिति

हम खुद को लेकर एक राय बना लेते हैं, जो आंतरिक अनुभवों पर टिकी होती है।, यानी हम जैसा सोचते हैं, जैसा महसूस करते हैं, जैसा मानते हैं। ऐसे में जब आवाज जैसी व्यक्तिगत चीज हमारी आंतरिक राय से अलग मिलती है, तो असहज कर जाती है।

साइकोलॉजी में यह अनुभव कॉग्निटिव डिसोनेंस के करीब होता है। जहां दिमाग वास्तविकता के दो वर्जन एक समय ही पर एकसाथ लेकर चलता है और जो कम जाना-पहचाना लगता है, उसे नकार देता है। इस स्थिति में मिलने वाला रिएक्शन न्यूट्रल बहुत कम दिखता है और अकस्मात व भावनात्मक होता है। अधिकतर लोग इस स्थिति को समझने की जगह सीधा बोल देते हैं कि उन्हें अपनी आवाज पसंद नहीं है।



रिएक्शन इतना पर्सनल क्यों फील होता है?

reaction on recorded own voice
रिकॉर्डेड आवाज का रिएक्शन (सांकेतिक तस्वीर)

यहां पर सेल्फ-अवेयरनेस की एक परत भी शामिल होती है। बाहर से अपनी आवाज सुनने पर आपका ऐसी चीजों पर भी ध्यान चला जाता है, जिन्हें आप अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। जैसे आपकी आवाज की टोन, ठहराव, आप वाक्य को किस तरह बनाते हैं या कहां सांस लेते हैं। इनपर ध्यान जाने के बाद कुछ लोग तुरंत खुद की आलोचना करने लगते हैं। अब आवाज केवल आवाज नहीं रह जाती, बल्कि राय बनाने लायक चीज बन जाती है। चूंकि यह बहुत पर्सनल चीज है, इसलिए हल्का सा अंतर भी बहुत बड़ा महसूस होता है।



क्या यह वक्त के साथ सही हो जाता है?

आप जितना अपनी आवाज को रिकॉर्डिंग में सुनते हैं, उतना यह अनुभव सामान्य होता जाता है। यह अब जानी-पहचानी लगने लगती है और असहज नहीं करती। धीरे-धीरे दिमाग अपनी आवाज के बाहरी रूप को अपनाने लगता है और पहचान से जोड़ लेता है।

खुद को अपनाने को लेकर एक छोटी-सी सीख

मेंटल हेल्थ के नजरिए में इस असहजता को ठीक करने की जरूरत नहीं होती। बल्कि अपनी समझ को बढ़ाना चाहिए कि हमारी पहचान अधिकतर आंतरिक राय से जुड़ी है और जब इस राय को चुनौती मिलती है तो स्थिति काफी असहजतापूर्ण हो जाती है। लेकिन यह स्थिति आत्म-स्वीकृति को सीखने का जरिया भी बन जाती है। यह सिखाती है कि आपको हर चीज को परफेक्ट बनाने की जरूरत नहीं है। धीरे-धीरे असहज स्थिति भी सामान्य लगनी शुरू हो जाती है और आपकी पहचान से जुड़ जाती है।

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