ग्रुप पर रेप के तरीके सिखा रहे, पत्नियों के साथ घटना को लाइव दिखा रहे: दहला देने वाले खुलासे पर साइकोलॉजिस्ट से बातचीत
सीएनएन की रिपोर्ट में एक ऐसे ग्रुप का खुलासा किया गया,जहां पर पुरुष एक-दूसरे को दुष्कर्म के तरीके सिखाने के साथ ही इसके लिए ड्रग्स का इस्तेमाल, घटना के लाइव वीडियो आदि शेयर करते थे। इसी तरह की एक साइट का भी इसमें जिक्र किया गया है। हमने साइकोलॉजिस्ट से समझने की कोशिश की कि आखिर क्यों कोई इंसान इस हद तक पहुंच जाता है।
खुलासे के बाद ग्रुप तो हटा दिया गया, लेकिन ये भी साफ था कि सिर्फ यही एक जगह नहीं है, जहां पर 'ऑनलाइन रेप यूनिवर्सिटी' रन की जा रही है। ऐसी साइट्स भी हैं, जहां पर एक महीने में करोड़ों लोग इस तरह के वीडियो साझा करने और देखने आते हैं।
इस तरह की रिपोर्ट को पढ़ने के बाद बतौर महिला मेरे मन में कई सवाल उमड़ पड़े। आखिर कोई इंसान इस हद तक कैसे गिर सकता है? कोई पुरुष दुष्कर्म जैसी घटना को क्यों अंजाम देगा और क्यों इस घिनौनी चीज को सीखना या सिखाना चाहेगा? अपनी ही पत्नी तक को न सिर्फ शिकार बनाएगा बल्कि उसके वीडियो भी सबके साथ शेयर करेगा?
पीड़ितों पर सच सामने आने के बाद मनोवैज्ञानिक रूप से क्या बीतती होगी? और जब इस तरह की रिपोर्ट्स दूसरी आम महिलाएं पढ़ती हैं, जो वैसे भी खुद की सुरक्षा को लेकर चिंतित ही रहती हैं, तो उनकी मानसिक व भावनात्मक सेहत पर इसका क्या असर होता होगा?
इन चीजों को विस्तार से समझने के लिए हमने सीनियर साइकोलॉजिस्ट नेहा कडबम से बातचीत की। उन्होंने नवभारतटाइम्स.कॉम के हेल्थ वेलनेस के लिए इस मुद्दे पर अपने एक्सक्लूजिव इनपुट्स दिए।
आखिर क्यों कोई पुरुष इस हद तक चला जाता है? कौन से फैक्टर उसे ये हिम्मत देते हैं कि वो इस तरह की यौन हिंसा को अंजाम दे सकता है?
अगर क्लिनिकल नजरिए से बात की जाए, तो इस प्रकार की यौन हिंसा को किसी एक मनोवैज्ञानिक कारण से जोड़ना मुश्किल होता है। बहुत ही कम ऐसा होता है कि कोई साइकोलॉजिकल ट्रिगर किसी व्यक्ति को इस हद तक पहुंचा सके। ज्यादातर मामलों में ये 'प्रोग्रेसिव डीसेंसिटाइजेशन' (किसी चीज से धीरे-धीरे परिचित होना और लगातार संपर्क पर उसके प्रति संवेदनशीलता कम होते जाना) और ऐसे माहौल की देन होता है, जहां बार-बार इसी तरह की सोच को बढ़ावा दिया जाता है। ये व्यक्ति की सोचने व समझने की क्षमता को ही बदलने लगता है।
इंटरनल सिस्टम में आने लगता है बदलाव
व्यक्ति जब बार-बार ऐसे लोगों के संपर्क में आता है, जो हानि पहुंचाने वाले व्यवहार की बेहिचक चर्चा करते हैं और उसे बढ़ावा देते हैं, तो मॉरल जजमेंट को रेग्युलेट करने वाले ब्रेन के इंटरनल सिस्टम में बदलाव आने लगता है। धीरे-धीरे उसकी सोच इस तरह ढलने लगती है कि उसे गलत चीजें भी सामान्य लगने लगती हैं। यानी ऐसा नहीं है कि बस एक दिन अचानक से किसी के अंदर की नैतिकता या मूल्यों का अंत हो जाए। ये तो उस लंबे समय से दिमाग में जा रही फीडिंग का नतीजा होता है, जो उसके गलत को देखने, समझने व भावनात्मक जिम्मेदारी लेने की क्षमता को खत्म कर देता है।ग्रुप में मिलता है और बढ़ावा
रिपोर्ट में जिस ग्रुप का जिक्र किया गया, उसमें बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे और सबका सामूहिक व्यवहार लगभग एक जैसा और उद्देश्य भी समान था। इस तरह के सेट-अप में व्यक्ति के गलत व्यवहार को बढ़ावा मिलने का सुरक्षित माहौल मिलता है, क्योंकि उसके आसपास के लोग भी उसकी ही तरह की हिंसात्मक और नकारात्मक सोच वाले होते हैं। इस कारण उसे अपने कृत्य के लिए किसी तरह का नैतिक दबाव या जिम्मेदारी महसूस नहीं होती। उल्टा उसे इस तरह के वातावरण में जो मान्यता, मार्गदर्शन और कुछ मामलों में तारीफ या इनाम मिलता है, उससे व्यक्ति के हौसले और बुलंद होने लगते हैं। उसे लगने लगता है कि वो जो कर रहा है वो सही है।अनॉनिमस रहना, जिम्मेदारी से है बचाता
इस तरह के ग्रुप में आइडेंटिटी का अनॉनिमस रहना (पहचान उजागर न होना) भी चीजों को और बढ़ावा देता है, क्योंकि व्यक्ति को मालूम होता है कि उसे अपने कृत्य के लिए तुरंत किसी तरह के नतीजे नहीं भुगतने पड़ेंगे। छिपी हुई पहचान और गलत को गलत बताने वाले लोगों के अभाव में वो इस तरह के हानि पहुंचाने वाले बर्ताव में खुद को बार-बार लिप्त करने लगता है। उसका दिमाग इसके अनुसार ढलते हुए जवाबदेही और अपराध बोध से खुद को मुक्त करने लगता है। उसे भावनात्मक रूप से अपने कृत्य के लिए किसी प्रकार की ग्लानि या शर्मिंदगी भी महसूस होना बंद हो जाती है। उसे लगता ही नहीं कि वो इस तरह ही यौन हिंसा को अंजाम देकर किसी तरह की सीमा को लांघ रहा है, क्योंकि उसके दिमाग के लिए तो सीमाओं की अवधारणा ही खत्म हो चुकी होती है।आपने जो समझाया उसके अनुसार घटना को अंजाम देने वाले का दिमाग तो इस क्रूर कृत्य के लिए ढल चुका होता है, लेकिन पीड़ितों का क्या? जब उन्हें एहसास होता है कि उनके साथ क्या हुआ है, तो ये उन पर क्या असर डालता है?
कम्पाउंड और लेयर्ड ट्रॉमा में डूब जाती है पीड़िता
इस तरह की घटना के पीड़ितों में सिर्फ उनके साथ हुए हिंसात्मक कृत्य का ट्रॉमा डेवलप नहीं होता, बल्कि उनका दिमाग तो 'कम्पाउंड और लेयर्ड ट्रॉमा' में डूबने लगता है। यानी किसी एक ट्रॉमा की जगह उनके ब्रेन में एक के बाद एक अलग-अलग तरह के ट्रॉमाज की जैसे परत दर परत बनने लग जाती है। ये इंसान के अंदर की सुरक्षा की भावना, खुद के फैसले लेने की क्षमता जैसी व्यवहारिक आजादी और अपने ही शरीर की गरिमा को लेकर सोच को हिला कर रख देती है।उसे जब ये मालूम चले कि जो हुआ वो एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा था, तब ये साइकोलॉजिकल ट्रॉमाज और गंभीर रूप ले लेते हैं। उसे एहसास होने लगता है कि घटना सिर्फ दो लोगों के बीच की बात नहीं थी, बल्कि इसमें कई लोगों की सोच, इरादे और अप्रत्यक्ष भागीदारी मौजूद थी। यही बात उसकी असुरक्षा की भावना को और गहरा कर देती है।
व्यवहार में आते हैं चिंताजनक बदलाव, खुद को समझने लगती है वस्तु
इस तरह की स्थिति का शिकार महिला में हाइटंड हाइपरविजिलेंस, लगातार बने रहने वाली एंग्जायटी की परेशानी, और दूसरों पर फिर से भरोसा करने में कठिनाई आने और पीटीएसडी जैसी समस्याएं दिखने लग जाती हैं। पीड़िता के दिमाग में खुद की जिंदगी पर नियंत्रण खोने का एहसास गहराने लगता है। ये मालूम चलने पर कि उसके साथ हुई घटना अचानक नहीं बल्कि एक सपोर्ट-बेस्ड स्ट्रक्चर के तहत बनाई और प्रोत्साहित की गई गतिविधि थी, तो उसे ऐसा एहसास होने लगता है जैसे वो कोई जीवित व्यक्ति नहीं बल्कि कोई वस्तु हो। उसमें खुद ही को लेकर 'ऑब्जेक्टिफिकेशन' का भाव गहरा जाता है।समय के साथ और गहरा होता जाता है ट्रॉमा
पीड़िता जैसे-जैसे चीजों पर और ध्यान डालती है और उसे घटना की बेहतर समझ होती जाती है, वैसे-वैसे उसका ट्रॉमा गहरा होता चला जाता है। स्थिति के उजागर होने से जन्म लेने वाली अन्य मनोवैज्ञानिक समस्याओं का स्तर भी गंभीर रूप लेने लगता है। पीड़िता को फिर दो तरह की सच्चाई का सामना करना होता है, पहला तो ये स्वीकारना कि उसके साथ वास्तव में ये घटना हुई है और दूसरा कि इससे जुड़ा सच उसकी शुरुआती समझ से ज्यादा क्रूर है। इस तरह की स्थिति अक्सर कॉग्निटिव डिसोनेंस (मानसिक असंतुलन) की समस्या पैदा कर देती है।इस स्टेज में जब पीड़िता पहुंचती है तो उसके व्यवहार में इंटेंस इमोशनल रिएक्शन जैसे ज्यादा गुस्सा आना या अचानक आउट बर्स्ट होना, रोने लगना आदि दिखने लगते हैं। उसे बार-बार अपने साथ हुई ज्यादती का एहसास होता है, वो कल्पना करने लगती है कि कैसे घटना को अंजाम दिया गया होगा, उसके बाद कृत्य को अंजाम देने वाले व्यक्ति ने क्या किया होगा, लोगों ने कैसे रिएक्ट किया होगा, उनका क्या रिएक्शन रहा होगा, आपस में उन्होंने क्या बातचीत की होगी आदि।
सालों लग जाते हैं उबरने में, कई दफा तो ताउम्र साथ रहता है ट्रॉमा
इस तरह के विचार जितनी बार उसके जहन में आते हैं, उतनी बार ये पीड़िता की इमोशनल एंड मेंटल हेल्थ को हिलाकर रख देते हैं। ये एक ऐसी ट्रॉमैटिक सिचुएशन होती है, जिसमें से बाहर निकलने में सालों का समय लग सकता है। ऐसे भी केस होते हैं, जिनमें लोग ताउम्र इससे खुद को आजाद नहीं कर पाते हैं।इस स्थिति में क्लिनिकल सहायता का जारी रहना काफी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। सच्चाई का सामना करने, ट्रॉमा को पीछे छोड़ने, खुद पर और दूसरों पर फिर से विश्वास कर पाने की क्षमता जैसी चीजों के लिए एक्सपर्ट गाइडेंस काफी मददगार साबित होती है। वहीं परिवार, दोस्तों व समाज का साथ भी अहम भूमिका निभाता है।
हालांकि, ये भी एक सच है कि जो पीड़िता नहीं हैं, वो भी जब ऐसी जानकारियों के संपर्क में आती हैं, तो उनमें भी एक बार फिर से असुरक्षा का भाव जन्म लेने लगता है। मेंटली वो इस तरह प्रभावित होती हैं कि कई मामलों में महिलाएं अपने आसपास के हर पुरुष को शक की निगाह से देखने लगती है। इतना ही नहीं भावनात्मक रूप से करीबी बढ़ाने पर भी उन्हें ज्यादा संकोच होने लगता है, क्योंकि उनका दिमाग घटना से जुड़ी जानकारियों को रेफ्रेंस की तरह इस्तेमाल करने लग जाता है, जिससे अविश्वास का भाव गहराता महसूस होता है।
क्या खुलासे हुए सीएनएन की रिपोर्ट में?
- आर्टिकल में ऐसे ऑनलाइन कम्युनिटी का ऐसा ग्लोबल नेटवर्क सामने आया जिसमें यौन हिंसा से जुड़ा कंटेंट साझा और प्रोत्साहित किया जाता था।
- ये ग्रुप फॉरम्स, चैट ऐप्स, और अश्लील कंटेंट परोसने वाली साइट्स पर खुलेआम ऑपरेट करते हैं। एक ऐसी ही टेलीग्राम ग्रुप Zzz में सीएनएन की टीम ने झूठी पहचान के आधार पर एंट्री की।
- इस ग्रुप के मेंबर्स ऐसे वीडियो और फोटो शेयर करते थे, जिनमें महिलाएं बेहोशी की हालत में दिखाई देती थीं। इस तरह के कंटेंट को 'स्लीप' लेबल दिया जाता था।
- इन महिलाओं को इस हालत में लाने के लिए ड्रग्स का इस्तेमाल किया जाता था। और फिर उनके साथ ज्यादती की जाती थी।
- घटना को अंजाम देने वालों ऐसे पुरुष भी शामिल थे, जो शादीशुदा थे और अपनी ही पत्नी को ड्रग्स देकर उनके साथ दुष्कर्म करते थे।
- इस ग्रुप में ड्रग्स के डोसेज, टाइप, सप्लाई के तरीके, नए ड्रग्स आदि जैसी चीजों की डीटेल्स से लेकर ज्यादती से जुड़े तरीकों पर चर्चा होती थी और सलाहें तक दी जाती थीं।
- ग्रुप के मेंबर्स इन वीडियो को बेचने के साथ ही ज्यादती को लाइव स्ट्रीम करते थे। इच्छुक लोगों को इन्हें देखने के लिए एक राशि का भुगतान करना होता था।
- पीड़ितों में पत्नियां, जान-पहचान वाली महिलाएं, या ऐसी लड़कियां शामिल थीं, जो रिलेशनशिप में थीं।
- रिपोर्ट में 'रेप एकेडमीज' टर्म का भी यूज किया गया, जो ये दिखाने के लिए था कि कैसे किसी पाठशाला की तरह यहां पर दुष्कर्म से जुड़ी क्लास या कोर्स चलाए जाते हैं।
- रिपोर्ट में इस तरह की चीजों की रोकथाम के लिए कमजोर लीगल सिस्टम और ग्लोबल एन्फोर्समेंट की कमी को भी हाइलाइट किया गया।
- जिस ग्रुप की जांच की गई थी, उसे शिकायत के बाद डिलीट कर दिया गया। वहीं वेबसाइट जहां इस तरह की चीजें मौजूद हैं और ग्रुप संचालित हो रहे हैं, उस पर कोई खास कार्रवाई नहीं हुई है।
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