बीमार व्यक्ति का ख्याल रखते-रखते टूटने लगता है परिवार, डॉ. ने समझाया कैसे इमोशनली खोखले होते जाते हैं केयर गिवर

 

बीमार व्यक्ति के बारे में चर्चा करना, हालचाल पूछना बेहद सामान्य है। लेकिन ऐसे लोग जो लंबे समय से किसी क्रोनिक डिजीज से पीड़ित व्यक्ति की केयर कर रहे हों, उनकी हालत के बारे में कम ही सोचा जाता है। डॉ. मालिनी सबा ने बताया कि केयर गिवर भी मेंटली और इमोशनली बुरी तरह से थक जाते हैं। लेकिन इसे जाहिर करना उन्हें ग्लानि से भर देता है, इसलिए ज्यादातर इसे लेकर चुप्पी साध लेते हैं।

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लेख में इस्तेमाल की गईं सभी तस्वीरें सांकेतिक हैं
परिवार में जब कोई लंबे समय से बीमारी से जूझ रहा हो, तो उसके परिवार की जिंदगी रुकती तो नहीं है, लेकिन वो बदल काफी जाती है। केयर गिवर्स पहले जहां इस चीज को लेकर काफी भावनात्मक होते हैं, वहीं समय के साथ-साथ इसकी जगह प्रैक्टिकल अप्रोच ले लेती है।

शारीरिक और मानसिक रूप से वो थक जाते हैं, लेकिन ये भी जानते हैं कि इसे वो खुलकर जाहिर नहीं कर सकते। इसके चलते उनके व्यवहार में चिड़चिड़ापन और दिमाग में इस भावना को महसूस करने का अपराधबोध घर कर जाता है। इस स्थिति को संभालने के लिए केयर गिवर्स को अपनी भावनाएं जाहिर करने की आजादी और करीबियों के सपोर्ट खासतौर पर भावनात्मक संबल की काफी जरूरत होती है।



बदल जाता है जीने का तरीका, भूल जाते हैं खुद का जीवन

सबसे पहले जब बीमारी के बारे में पता चलता है, तो चेकअप से लेकर अन्य चीजें सामान्य लगती हैं। लेकिन लंबे समय तक इसके जारी रहने पर जिंदगी जीने का तरीका ही बदलने लग जाता है।

डॉक्टर के पास बार-बार जाना, खाने-पीने के विकल्प और समय बदलना, प्रभावित व्यक्ति की नींद और दवाइयों को ट्रैक करना, जरा सा भी बदलाव दिखने पर तुरंत चौकस हो जाना आदि व्यक्ति को कॉन्सटेंट अलर्ट मोड (हमेशा चौकस बने रहना) में ले जाता है।

शुरुआत में ये बदलाव ज्यादा बड़े नहीं लगते, लेकिन सच तो ये होता है कि धीरे-धीरे केयर गिवर की पूरी जिंदगी बदलने लग जाती है। वो घबराता नहीं है, लेकिन उसका दिमाग चिंता मुक्त नहीं रह पाता है।



स्थिति जब काबू में भी रहती है और उसमें सुधार हो रहा होता है, तब भी उसके मन में ये विचार चलता रहता है कि अगर चीजें फिर से बदल गईं तो क्या होगा? इस खामोश बदलाव के बीच वो खुद के बारे में सोचना जैसे भूल सा जाता है।

उसे एहसास नहीं होता कि वो किस तरह की संघर्षपूर्ण स्थिति से गुजर रहा है और ये उस पर क्या असर डाल रही है। उसे ये भी पता नहीं चलता कि लगातार इस स्थिति में रहने पर धीरे-धीरे उसकी खुद की ऊर्जा खत्म होती जा रही है।




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मरीज के इर्द-गिर्द बुन जाता है पूरा जीवन

भावनाएं रह जाती हैं पीछे, अंदर बढ़ने लगता है खोखलापन

क्रोनिक डिजीज के मरीज का परिवार अक्सर बहुत ज्यादा प्रैक्टिकल हो जाता है। वो सिर्फ इस बात पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं कि क्या करना है और क्या नहीं। इस सब में भावनाओं की जगह नहीं रह जाती। सभी फैसले व्यावहारिक होकर लिए जाते हैं। ये एक तरह का भावनात्मक खोखलापन निर्मित कर देता है।

हालांकि, ये बात अलग है कि वो भले ही इस पर ध्यान न दें, लेकिन चिड़चिड़ाहट के पल उनकी थकान को बयां कर देते हैं। जब ऐसा होता है, तो खुद पर नरमी से पेश आने की जगह वो अपराधबोध के भाव में चले जाते हैं और खुद ही को कोसने लगते हैं।



केयर गिवर अपनी भावनाओं को चुप्पी में दबा देते हैं। वो नहीं चाहते कि उन्हें कोई स्वार्थी समझे या उनकी कमजोरी किसी और का बोझ बढ़ा दे। लेकिन ये अनकही भावनाएं गायब नहीं हो जातीं, बल्कि ये तो वहां भी दूरियां पैदा करने लगती हैं, जहां पहले अपनेपन, प्यार और सहजता का करीबी रिश्ता हुआ करता था।


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रिलेशन और बॉन्ड पर हावी हो जाता है जिम्मेदारी का भाव

रिश्तों पर हावी हो जाती है जिम्मेदारी, बदल जाती है बॉन्डिंग

परिवार में क्रोनिक डिजीज से पीड़ित व्यक्ति की मौजूदगी का असर सबसे ज्यादा रिश्तों पर नजर आता है। उदाहरण के लिए पति या पत्नी का जीवनसाथी की जगह पूरी तरह से केयर गिवर की भूमिका में चले जाना या घर के बच्चों का जिम्मेदारियों व स्थितियों के चलते उम्र से पहले मैच्योर हो जाना। पहले जो परिवार हंसते-खेलते रोज के दिन बिताता था, उसके बीच की बातचीत बीमार या फिर बीमारी पर केंद्रित हो जाती है।



इसका मतलब ये नहीं है कि सदस्यों के बीच प्यार नहीं रह जाता, लेकिन उससे ज्यादा गहरा जिम्मेदारी का भाव हो जाता है और इसीलिए सबकुछ बदलने लगता है। परिवार के सदस्य ऐसी किसी भी चीज के बारे में सोचना रोक देते हैं, जो सिर्फ उन पर केंद्रित हो। पहले उनके पास जो कहीं भी और कभी भी चले जाने की, कुछ भी करने की, अपने ऊपर फोकस रखने की आजादी थी, वो चुपचाप जिम्मेदारियों के तले दबती और गुम होती चली जाती है।


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एक पर न डालें जिम्मेदारी का भार, मिलकर रखें ख्याल

छोटी-छोटी चीजें जो कर सकती हैं मदद

  • इस तरह की स्थिति में परिवार को परफेक्शन की फिक्र छोड़ खुद को और स्थितियों को लेकर जागरूकता दिखाने की जरूरत है।
  • केयर गिवर अपने मानस को इस तरह से प्रशिक्षण दे कि वो बिना किसी ग्लानि या कमजोरी के भाव के कह सके 'ये सब बहुत मुश्किल है'।
  • किसी एक पर पूरी जिम्मेदारी का भार न डालते हुए, उसे सभी के बीच बांटें। भले ही ये छोटे-छोटे काम हों, लेकिन ये केयर गिवर के लिए बहुत बड़ा सहारा साबित होते हैं।
  • फिजिकल के साथ इमोशनल हेल्थ पर ध्यान दें। केयर गिवर को अपने व्यवहार, मूड आदि पर ध्यान देना जरूरी है।
अगर केयर गिवर को लगता है कि उसके द्वारा उठाए गए कदम भी स्थिति को नहीं सुधार रहे हैं और उसे सपोर्ट की जरूरत है, तो मदद लेने से हिचकिचाना नहीं चाहिए। प्रोफेशनल हेल्प लेना भी इस मामले में एक बेहद अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। क्योंकि एक्सपर्ट व्यक्ति को सही तरीके से इमोशन्स को चैनलाइज करना सिखा सकते हैं। याद रखें कि खुद को एक्सप्रेस करना केयर गिवर के लिए बेहद अहम होता है। क्योंकि भावनाओं को दबाना अंत में नकारात्मक परिणाम लेकर आ सकता है।

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