महिलाओं के लिए कहा जाता है कि उनके मन को समझना बहुत मुश्किल है। लेकिन महिलाओं का बनता-बिगड़ता मूड कई बार व्यवहार नहीं, बीमारी का संकेत होता है। पल भर में खुश हो जाना और अगले पल उदास होना ‘बाइपोलर डिसऑर्डर’ का संकेत हो सकता है। ‘वर्ल्ड बाइपोलर डे’ के अवसर पर इस रोग के कारण और बचाव के उपाय जानना जरूरी है।

महिलाओं में बाइपोलर डिसऑर्डर के संकेतों को अक्सर मूड स्विंग समझ लिया जाता है, जिससे रोग का पता देर से चलता है और समस्या ज्यादा जटिल हो जाती है। बाइपोलर डिसऑर्डर पुरुषों और महिलाओं दोनों को प्रभावित करता है, लेकिन महिलाओं में इसके लक्षण अलग होते हैं। महिलाओं पर हार्मोंस का प्रभाव
महिलाओं के जीवन पर हार्मोंस का गहरा प्रभाव होता है इसलिए उनमे बाइपोलर डिसऑर्डर का असर बायोलॉजिकल और हार्मोनल भी होता है। साथ ही इसमें सामाजिक कारण भी हो सकते हैं। पुरुष और महिला में ये अंतर उनके व्यवहार में भी साफ नजर आते हैं, जिसके कारण दोनों के इलाज की प्रक्रिया भी अलग हो सकती है।
मिक्स्ड एपिसोड का असर
महिलाओं में बाइपोलर डिसऑर्डर की एक खास विशेषता मिक्स्ड एपिसोड (Mixed Episodes) का अनुभव करना है, जिसमें डिप्रेशन और मैनिया के लक्षण एक साथ दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए- महिलाएं एक ही समय पर उदासी, निराशा या थकान महसूस कर सकती हैं और उसी समय उन्हें बेचैनी, चिड़चिड़ापन, बहुत सारे विचार आना या नींद न आने की समस्या भी हो सकती है। यह स्थिति महिला के साथ रहने वाले व्यक्ति और हेल्थ एक्सपर्ट दोनों को भ्रमित कर सकती है। महिलाओं में अक्सर इस समस्या को एंग्जायटी या डिप्रेशन समझ लिया जाता है।
मिक्स्ड एपिसोड के दौरान मैनिया की बेचैनी और डिप्रेशन की निराशा एक साथ मिल जाती है, जिससे व्यवहार अग्रेसिव हो सकता है और भावनात्मक अस्थिरता का खतरा बढ़ जाता है। महिलाओं में मिक्स्ड एपिसोड के लक्षणों को पहचान कर इलाज की प्रक्रिया जल्दी शुरू की जा सकती है।
रैपिड साइकलिंग के लक्षण
महिलाओं में रैपिड साइकलिंग (Rapid Cycling) की संभावना भी अधिक होती है, जिसमें मूड एपिसोड बहुत तेजी से बदलते हैं। ये बदलाव कभी कुछ दिनों में, तो कभी हफ्तों में नजर आ सकता है। इससे यह स्थिति अनिश्चित और नियंत्रित करने में कठिन लगती है। इसका असर महिला की डेली लाइफ, रिश्तों और काम पर भी पड़ता है। रैपिड साइकलिंग का संबंध अक्सर हार्मोनल बदलावों से होता है। ये हार्मोनल बदलाव ट्रिगर की तरह काम करते हैं, जिससे महिला का व्यवहार बार-बार बदलता है।
महिलाओं में बाइपोलर डिसऑर्डर कब होता है?
महिलाओं के शरीर में जब भी हार्मोनल बदलाव होता है तब उन्हें बाइपोलर डिसऑर्डर होने की संभावना बढ़ जाती है जैसे-
- प्रेग्नेंसी के दौरान- प्रेग्नेंसी को आमतौर पर भावनात्मक स्थिरता का समय माना जाता है, लेकिन बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित महिलाओं के लिए यह संवेदनशील समय हो सकता है। कुछ महिलाओं में इस दौरान लक्षण नियंत्रित रहते हैं, जबकि कुछ में यह बढ़ सकते हैं, खासकर तब जब भ्रूण की सुरक्षा के कारण दवाओं में बदलाव या उन्हें बंद कर दिया जाता है।
- प्रसव के बाद- महिलाओं के लिए प्रसव के बाद का समय सबसे अधिक जोखिम वाला होता है। इस दौरान महिलाओं में गंभीर मूड एपिसोड विकसित होने की संभावना अधिक होती है। इस दौरान महिलाओं में पोस्टपार्टम डिप्रेशन या पोस्टपार्टम साइकोसिस होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। पोस्टपार्टम साइकोसिस एक गंभीर स्थिति है, जिसमें भ्रम, मतिभ्रम और अत्यधिक मूड परिवर्तन होते हैं, और इसमें तुरंत चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता होती है।
- मेनोपॉज स्टेज में- बाइपोलर डिसऑर्डर की स्थिति को मेनोपॉज और जटिल बना देता है। इस समय एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर धीरे-धीरे कम होता है, जिससे मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर सिस्टम प्रभावित हो सकते हैं और मूड अस्थिरता बढ़ सकती है। इस दौरान महिलाएं चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या, चिंता या डिप्रेशन जैसे लक्षणों का अनुभव कर सकती हैं। जो महिलाएं पहले से बाइपोलर डिसऑर्डर से ग्रस्त हैं, उनमें इसके लक्षण फिर से नजर आ सकते हैं। इस दौरान नियमित निगरानी और उपचार में बदलाव की आवश्यकता हो सकती है।
महिलाओं के व्यवहार को समझें
महिलाओं के जीवन में कई सामाजिक जिम्मेदारियां होती हैं, जैसे परिवार की देखभाल, काम और घर के बीच संतुलन, सामाजिक अपेक्षाएं, ये सभी अक्सर महिलाओं के जीवन में तनाव पैदा कर सकते हैं, जो मूड एपिसोड को ट्रिगर कर सकते हैं। महिलाओं में बाइपोलर डिसऑर्डर के लक्षणों की जल्दी पहचान की जाए तो इलाज जल्दी हो सकता है। जागरूकता से महिलाओं को इस रोग से बचाया जा सकता है।
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